Monday, April 6, 2009

जड़


शरीर को मात्र जड़ समझने वाले लोग यह नही जानते कि यह शरीर वह जड़ है जिसका आधार लेकर चेतना की बेल बढती जाती है ।

एक दिन उसमें ज्ञान के फूल भी खिल उठते हैं ।


शैलेन्द्र शर्मा ...

महानता


किसी भी क्षेत्र में सफलता और महानता हासिल करने के लिए व्यक्ति को अत्यधिक तीब्र बुद्धि और प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है ।

शैलेन्द्र शर्मा ..

शरीर की पीड़ा


स्वयम को आध्यात्मिक मानने वाले व्यक्ति अपने शरीर को तप करने के भ्रम में अनेक प्रकार से पीड़ित कर लेते हैं । वे लोग केवल शारीरिक , मानसिक विकृति को ही प्राप्त होते हैं । वे समझ नही पाते कि शरीर को उसकी अन्तिम सीमा तक विकसित कर लेना ही एक कठोर तपस्या का परिणाम है ।


शैलेन्द्र शर्मा ...

चरित्र


चरित्र जैसे महान शब्द को कम तक ही सीमित कर दिया है । जबकि जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा व्यक्ति कैसे पूरी करता है , वही उसका चरित्र होता है ।

उसका प्रयास , सफलता , असफलता , समझ आदि चरित्र मने जाते हैं । लेकिन जिस समय चलते -चलते चलने की इति हो जाती है , उसी समय से चरित्र का जन्म होता है ।


शैलेन्द्र शर्मा ...

प्राणायाम


याम शब्द का तात्पर्य है तीन घंटे , जो साधक तीन घंटे तक प्राण का आयाम श्वांस के साथ कर सकता है , उसी को परनायम का साधक कहा जाता है ।

शरीर से प्राण निकलने के तीन घंटे तक कोई विकृति नही आती है । प्राण के आयाम को को एक याम तक विस्तृत करने वाले साधक ही शरीर के मध्यम से मृत्यु का साक्षात्कार कर पते हैं । यही प्राणायाम की साधना है ।


शैलेन्द्र शर्मा ...

क्लान्ति


क्लान्ति का अस्तित्व उन लोगों के लिए ही है , जो अपने जीवन का लक्ष्य नही समझ पाते । जो लोग लक्ष्य समझ पाए हैं वे उसे पाने के लिए प्राण -प्रण से प्रयास करते हैं । ऐसे व्यक्तियों के लिए क्लान्ति का अस्तित्व नही रहता ।

वे लक्ष्य की तरफ़ चलते ही जाते हैं । जब शरीर की गति समाप्त होती है तब , उनकी चेतना उन्हें आगे ले जाती है .लक्ष्य स्पष्ट होने पर ही यात्रा आरम्भ होती है ।


शैलेन्द्र शर्मा ...

मस्तिष्क का विकास


जिस व्यक्ति का शारीरिक विकास अपूर्ण रह जाता है , उसे जीवन की संध्या में अनुभव होता है कि वे कुछ नही कर पाए । और वे व्यक्ति जिन्होंने शारीरिक ऊँचाइयों को छुआ , उन्हें कभी निराश नही होना पड़ा ।

शारीरिक विकास करते हुए वे समझ सके कि मूल रूप से वे मस्तिष्क की क्षमताओं का ही विकास कर रहे थे । तब वे पूर्ण रूप से मस्तिष्क को समझ जाते हैं ।

शरीर और मस्तिष्क के भीतर छुपी दिव्यता को समझ पाते हैं । जागरूकता इस बात की है कि हम कहीं रुक न जायें । निरंतर आगे बढ़ते ही रहें ।


शैलेन्द्र शर्मा ...